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6 points: जंगल बुक (The Jungle Book)

“जंगल-जंगल पता चला है, चड्डी पहन के फूल खिला है…” कुछ दिन पहले डिज़्नी के नये जंगल बुक का हिन्दी ट्रेलर आया, गुलज़ार-विशाल के २० साल पुराने गाने के नये रूप के साथ. और मेरी उमर के आस-पास के सारे […]

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छपा: हिजरत से पहले

पढ़ने की आदत बचपन से ही लगी, थैंक्स टू हमारे दोनें चाचाजी, जिन्हें प्यार से हम मंझले और छोटे पापा कहते हैं. और कलकत्ते में रहने वाला पढ़ाकू बालक जनवरी-फरवरी के पुस्तक मेले से अनभिज्ञ रह सकता है भला? बरसों […]

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खिड़कियाँ

जब कभी किसी गली या सड़क से गुज़रता हूं, ख़ुद को वहाँ के घरों की खिड़कियों से अंदर झाँकता हुआ पाता हूँ. अंदर क्या दिखता है? क्या ही तो दिखता होगा साहब. मैं हूँ ज़मीन पर, और देख रहा हूँ […]

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मच्छर, जैसे समाज है

जैसे आप अपनी ज़िंदगी जी रहे होते हैं, और भरसक कोशिश करते हैं, कि जो जीवन में करणीय है वह करते रहें, वैसे ही सोने की कोशिश कर रहा हूँ, क्योंकि अब रात का समय है, सोना चाहिये। और जैसे […]

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Outrage

सुबह-सुबह चायवाले को आवाज़ देने निकला तो देखा सामने दुबे जी के मकान के आगे पुलिस खड़ी है. होगा कोई चक्कर. ये प्रेस वाले तो ऐसे लफड़ों में फंसते ही रहते हैं. “इ धरिये चाय. और कल तक का दू […]

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मुकुट

“कितना सुंदर राजमुकुट है अपने राजा का!” “हाँ, वो तो है. सारे जगत में इससे भव्य राजमुकुट और किसी देश का नहीं है.” “किलो भर सोना होगा, नहीं? हीरे-जवाहरात भी बहुत हैं. मोती-माणिक भी.” “और क्या? विदेशी कारीगरों से बनवाया […]

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वागर्थ मिल गया!

हिन्दी साहित्य पढ़ते हैं? हां? कमाल है! कम लोग बचे हैं ऐसे. अरे मज़ाक कर रहा हूं! ऐसा नहीं है. काफी हिन्दी साहित्य प्रेमी हैं आज भी, और इंटरनेट पर तो बहुत हैं. इतने सारे हिन्दी के ब्लॉग भी हैं. […]

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Posted by Amit
सदी क्या हुई है भाईसाहब?

किस युग में रहते हैं आप? मुझे लगता था इक्कीसवीं सदी चल रही है. आजकल थोड़ा शक होने लगा है. टीवी पर समाचार चैनल वाले यूं ही परेशान करे बैठे हैं – स्वर्ग का द्वार, रावण की मम्मी, फिल्मी गाने […]

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