छपा: हिजरत से पहले

पढ़ने की आदत बचपन से ही लगी, थैंक्स टू हमारे दोनें चाचाजी, जिन्हें प्यार से हम मंझले और छोटे पापा कहते हैं.
और कलकत्ते में रहने वाला पढ़ाकू बालक जनवरी-फरवरी के पुस्तक मेले से अनभिज्ञ रह सकता है भला?

बरसों तक हर बरस कलकत्ते के प्रचण्ड पुस्तक मेला, उर्फ़ बोई मैला, उर्फ़ बुक फेयर में लिटरली खाक छानी, क्योंकि उन दिनों ये धूल से लबालब कलकत्ता मैदान में आयोजित हुआ करता था.

और इसी मेले में एस्ट्रिक्स, टिनटिन, आर्चीज़, और चमकीली विदेशी किताबों के साथ एक छोटे-से हिंदी कोने में पाँच-छ: दुकानों पर हिंदी की किताबें बाँचने और खरीदने की लत पड़ी. उन्हीं दुकानों में से एक था राजकमल प्रकाशन. किताबों और लेखकों की मेरी पसंद की गहराई नापी, तो पाया कि सारा मेला एक तरफ और राजकमल का स्टॉल एक तरफ. साल-दर-साल मेले से आने वाले झोलों में राजकमल की किताबें ही आधी जगह लेती रहीं.

आज भी, कलकत्ते वाले मकान में भी, और यहाँ बंबई में मेरे हर घर के बदलाव पर मेरे साथ फिरने वाली मेरी निजी लाइब्रेरी में भी अधिकतर किताबें राजकमल की ही होंगी.

खैर, लंबी रही भूमिका. तो आज की डाक से मुझे मिला एक प्यारा तोहफा, राजकमल के दफ्तर से, जो कि आज मेरे रोमांच का कारण बना हुआ है. तोहफे में है, उनके द्वारा प्रकाशित किताब, वंदना राग की हिजरत से पहले, क्योंकि उस के कवर पे जो गुलमोहर के फूल की तसवीर है, वह खाकसार की खींची हुई है, एक प्रति रवीश कुमार की लप्रेक किताब, इश्क़ में शहर होना, क्योंकि मानार्थ, और एक चेक, जो कि उस गुलमोहर के फूल के सदके है.

rajkamal

खिड़कियाँ

जब कभी किसी गली या सड़क से गुज़रता हूं, ख़ुद को वहाँ के घरों की खिड़कियों से अंदर झाँकता हुआ पाता हूँ.

अंदर क्या दिखता है?

क्या ही तो दिखता होगा साहब. मैं हूँ ज़मीन पर, और देख रहा हूँ पहली-दूसरी मंज़िल के कमरों में.
दिखते हैं, बल्ब, ट्यूबलाइट, पंखे, छत, दीवार, मचानों पर रखे सूटकेस और दीवारों के रंग.

इन्हीं सब को देखते-देखते मैं गढ़ता हूँ एक दुनिया, कुछ ज़िंदगियाँ, उस घर के बाशिंदों की.

क्या बच्चों को पढ़ने के लिये खाने की मेज़ पर कोहनियाँ टिका कर बैठना होता है? या बिस्तर पर ही पालथी मारकर बैठते हैं, या टीवी के सामने ही?

जब पापा घर आते हैं, तो क्या घंटी बजाते हैं? या ख़ुद की चाबी से ख़ुद ही दरवाज़ा खोल लेते हैं? उनके आने की आवाज़ से क्या बच्चे उछल कर दरवाज़े की ओर लपकते हैं, या कोई पालतू कुत्ता है जो उनपर लपकने को तैयार बैठा है, या सभी कोई मैच ही देख रहे होते हैं, और कहते हैं, रोज़ तो आते हैं, नया क्या है?

खाने की ख़ुशबू क्या घर के कोने-कोने में जाती है, या माँ को बार-बार चिल्लाना पड़ता है, कि खाना लग गया है, आओ जल्दी?

क्या इस घर में बिजली गुल होती है? और होती है, तो कितनी मोमबत्तियाँ जलाई जाती हैं? एक ही जिसके इर्द-गिर्द पढ़ाई, सब्ज़ी काटना, कशीदाकारी सब होता है, या हर कमरे को अलग बत्ती मिलती है. या फिर इन्वर्टर जैसा कोई साधन है घर में, जिससे ये ही पता न चले कि बिजली रानी रूठी हैं?

इस घर में कुत्ते की प्यारी सी दुम हिलती है जब दूध से भरा कटोरा उसके सामने रखा जाता है, या एक बिल्ली का बच्चा है, जो डिब्बों में अपनी एक दुनिया बना लेता है, और उन्हें ही अपना क़िला मान प्रहरी सा उनकी रखवाली करता है? या फिर यहाँ एक शीशे का हौदा है, जिसमें सुंदर-सुंदर नन्ही-नन्ही मछलियाँ सारा दिन अथक तैरती रहती हैं, या एक पिंजरा है, जिसमें चिड़ियां चूं-चूं-चीं-चीं करते-करते पिंजरे के इस तार से उस तार पर फुदकती-बैठती हैं?

इस घर में सोते वक़्त बच्चों को कहानी कौन सुनाता है? नानी, दादी, माँ, या पापा? या बच्चे इतने सयाने हैं कि ख़ुद ही टीवी पर देखा दिन भर का हाल बड़ों को सुनाते हैं?

शाम को बैठक जमती है या नहीं, जिसमें छुटकी नयी साइकिल लेने की फरमाइश करती है, और मुन्ना ट्रेकिंग ट्रिप पे जाने की ज़िद करता है? और ये सब सुनकर माँ-पापा उन्हें डपटते हैं, या ये कहते हैं, कि देखेंगे, अच्छे नंबर लाओ पहले?

कोई है इस घर में जो सचिन बनने के सपने देखता है, या कोई है जिसे डांसर बनने की धुन सवार है? या कि सब सपने बाद में, पहले पढ़ाई करो, ये सब करने को ज़िंदगी पड़ी है की नसीहत मिलती है उन्हें?

ऐसे ही कितना कुछ सोचता हूँ, जब भी किसी खिड़की के पास से गुज़रता हूँ. दस-पंद्रह सेकंड को एक नयी दुनिया, एक कोई और ज़िंदगी सोचता हूँ. शायद कल्पना करता हूँ उस सब की जो मैंने नहीं भोगा, या उस सब को याद करता हूँ, जो मेरा हर रोज़ हुआ करता था, और आज यादों में कहीं छुपा पड़ा है.

चलिये अब अगली खिड़की पर, दीवारें पीली हैं, और अलमारी के ऊपर शायद कुछ डब्बे रखे हैं, और पंखा धीमे-धीमे चल रहा है…

मच्छर, जैसे समाज है

जैसे आप अपनी ज़िंदगी जी रहे होते हैं, और भरसक कोशिश करते हैं, कि जो जीवन में करणीय है वह करते रहें, वैसे ही सोने की कोशिश कर रहा हूँ, क्योंकि अब रात का समय है, सोना चाहिये।

और जैसे आम ज़िंदगी में ‘समाज’ कभी कान के पास भिनभिनाता कर तंग करता है, कभी इधर, कभी उधर दंश मारकर उड़ जाता है, और मोटे तौर पर हमारा ख़ून चूसता है, ये बेचारे मच्छर भी वही करते हैं।

और जैसे ‘समाज’ कोई एक इंसान नहीं होता, एक बेनाम, faceless mass होता है, मच्छर की भी individual पहचान कहाँ होती है? उन्हें भी हम बस मच्छर ही कहते हैं, मसलन ‘मच्छर ने काटा’, जैसे ‘लोग कह रहे थे’।

आजतक हमें कोई ये समझा नहीं पाया कि भगवान ने मच्छर बनाये क्यों. हमारा faceless वाला समाज क्यों exist करता है, ये बात भी कभी पल्ले नहीं पड़ी.

और जैसे ज़िंदगी में आप समाज को नज़रअंदाज़ करने की भरसक चेष्टा करते हैं, लेकिन समाज पूरी बेशर्मी के साथ लगा हुआ होता है, खून चूसने, कान के आसपास भिनभिनाने, और आपको मोटे तौर पर तंग करने में, वैसे ही मैंने खूब चेष्टा की, कि नींद के साथ पूरी दोस्ती करूँ, मच्छरों को नज़रअंदाज़ करूँ, पर ये कमबख़्त डटे हुए हैं, जहाँ-तहाँ काटते हुए, इस बात का पूरा इंतज़ाम करते हुए, कि मैं और भले कुछ कर लूँ, पर सो न पाऊँ, और सुबह ऐसे कहूँ, कि ‘यार मच्छरों ने सोने नहीं दिया’, जैसे अक्सर कहा जाता है, ‘समाज के सामने मुँह दिखाने लायक तो रहना चाहिये (यानि अपनी न करो, सबकी करो)’।

और जैसे हम ज़िदगी में ज़रूरी चीज़ें बाजू में रखकर समाज का क्रिटीक लिखने बैठ जाते हैं, वैसे ही मैं भी मच्छर के दंश की पीड़ावश सोना भूलकर ये अनाप-शनाप लिखने बैठ गया हूँ।

Disclaimer: मच्छर-गण क्षमा करें, आपकी ‘लोगों’ से तुलना कर दी है। आधी नींद में ऐसा ही कुछ लिख पाता हूँ। इसकी ज़िम्मेदारी आप ही की है। और जैसे समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उनके बारे में क्या सोचते-बोलते हैं, वैसे ही मुझे भरोसा है मच्छर भी मेरा लिखा कुछ नहीं पढ़ेंगे।

(Image courtesy: www.noeticart.com)

Outrage

सुबह-सुबह चायवाले को आवाज़ देने निकला तो देखा सामने दुबे जी के मकान के आगे पुलिस खड़ी है. होगा कोई चक्कर. ये प्रेस वाले तो ऐसे लफड़ों में फंसते ही रहते हैं.
“इ धरिये चाय. और कल तक का दू सौ बीस रुपिया हुआ है.”
“अच्छा. शाम को दे दूंगा.”

“अरे भाई मुझे भी देता जा, ये ले एक चाय के पाँच रुपये”, मेरे पड़ोस की खोली के मिस्टर मदन बोल पड़े. “सुबह-सुबह बवाल हो गया दुबे जी के घर, पता है आपको?”, मुझसे मुखातिब होकर वे बोले.

“कैसा बवाल भई?”
“अरे उनके अखबार में कल एक चुटकुला छपा था. उसी को लेके कुछ लोगों का एक झुण्ड आया था सफाई मांगने.”
“कोई धार्मिक माइनोरिटी थी?”
“ना.”
“किसी जाति-विशेष के उपर कुछ उल्टा-सीधा लिख दिया?”
“नहीं साहब.”
“कोई राज्य… शहर वाले. ताल्लुके.”
मदन बाबू सिर्फ ना में सर हिलाते रहे, मानों मैं कोई मज़ेदार पहेली बूझ नहीं पा रहा.

“अच्छा, अपंग? कैंसर पीड़ित? छि:-छि: ऐसे अभागों पे चुटकुले कोई छापता है अखबार में?”

“अरे नहीं साहब, ऐसा कोई नहीं था.”

“फिर कौन हो सकते हैं भाई? मुझे और कुछ नहीं सूझता.”

“हरी कार चलाने वाले लोग आये थे. चुटकुले में एक हरी कार के मालिक को थोड़ा बेवकूफ-सा बताया गया था. बोल रहे थे, हम पर कटाक्ष करके अच्छा नहीं किया. दुबे जी बेचारे को माफी मांगनी पड़ी”, चाय पी चुके मदन बाबू मंद-मंद मुस्कराते हुए अपने कमरे में तशरीफ ले गये.

 

मुकुट

“कितना सुंदर राजमुकुट है अपने राजा का!”
“हाँ, वो तो है. सारे जगत में इससे भव्य राजमुकुट और किसी देश का नहीं है.”
“किलो भर सोना होगा, नहीं? हीरे-जवाहरात भी बहुत हैं. मोती-माणिक भी.”
“और क्या? विदेशी कारीगरों से बनवाया है. हमारे देश की शान है ये मुकुट.”
“सुरक्षा भी होगी तगड़ी.”
“हाँ, हमारी सेना की सबसे बहादुर टुकड़ी सिर्फ मुकुट की सुरक्षा के लिए ही बनायी गयी है. और रखरखाव के लिये दर्जन भर कर्मचारी हैं. और इन सब की पोशाक बाकी सेना-पुलिस से अलग होती है.”

उसने मेरी तरफ चाय की प्याली बढ़ाई. चाय की चुस्कियाँ लेते हुए मैं बाहर देखने लगा.

“बारिश का पानी कितना जम गया है.”
“हाँ. मुन्सिपाल्टी से कोई देखने भी नहीं आ रहा. कहते हैं बजट बनाते समय इसकी आशंसा नहीं थी. खर्चा बहुत ज़्यादा हो गया है इस साल.”
“लोग बीमार भी पड़ रहे होंगे.”
“हाँ. सामने की बस्ती में चार लड़के मरे कल. कह रहे हैं शायद हैज़ा है.”
“इलाज नहीं करवाया था?”
“अस्पताल गये थे.”
“फिर?”
“अरे अस्पताल में दवाइयाँ कहाँ होती हैं इतने लोगों के लिये? देश का बजट तो देखा है तुमने, रक्षा में इतना खर्च हो रहा है, स्वास्थ्य के लिए कुछ बचा ही नहीं.”
“हाँ ऐसा पड़ोसी भगवान किसी देश को न दे. पर, दवाइयाँ तो प्राइवेट दुकान से ला सकते थे.”
“अरे भाई अस्पताल वालों ने भी तो मना कर दिया उन्हें अस्पताल में लेने से.”
“क्यों? वहाँ तो फीस भी बहुत कम है.”
“ऊपर से देने को कुछ था नहीं इन बेचारों के पास.”
“रिश्वत?”
“हाँ.”

चाय खत्म हो चुकी थी. बारिश फिर शुरू हो गई. टीवी का कैमरा फिर राजा पर केन्द्रित हो गया. राजा बड़े शान से विश्वविद्यालय से मानद डाक्टरेट की उपाधि ग्रहण कर रहे थे. उपाधि देने के बाद कुलाधिपति ने नतमस्तक होकर राजा को सलाम किया. फिर उन्होंने राजा की तारीफों के पुल बाँधे.

पत्रकारों ने राजा की महानता से सम्बद्ध सवाल किये, और इसी बहाने उनका गुणगान किया. पीछे बैठे एक पत्रकार ने पूछा – “हमारे देश के अभागाबाद में पिछले महीने बारिश से सारे रास्ते बंद हो गये, कारबार ठप्प हो गया, बस्तियाँ पानी में डूबी रहीं, कई लोग बीमार पड़े और मर गये, और किसी अस्पताल में गरीब बीमारों को दाखिला नहीं मिला. राजा या कोई अफसर एक बार भी वहाँ का हाल जानने नहीं गये…”

उसकी बात पूरी न हो पायी थी कि छः सिपाही आये और उसे घसीटते हुए वहाँ से बाहर ले गये.

कार्यक्रम जारी रहा. कुलाधिपति ने राजा से माफी माँगी और कहा कि ये ज़रूर पड़ोसी देश का कोई एजेण्ट होगा जो जनता को हमारे स्वर्णिम राज के खिलाफ भड़काना चाहता है. आधे घण्टे बाद टीवी समाचार में इस तथ्य की पुष्टि की गयी कि वो पत्रकार के भेस में वाकई पड़ोसी देश का एक आतंकवादी ही है.

“अपने अभागाबाद की कोई खबर नहीं दिखाते टीवी में?”
“अरे इससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण खबरें हैं, और कौन आएगा इस हालत में इसे कवर करने? पता भी है राजधानी कितनी दूर है यहाँ से?”

टीवी पर एक फिल्मी हिरोइन के कुत्ते के प्रेम प्रसंग पर ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही थी.

थोड़ी देर हम चुपचाप बारिश को देखते रहे. बिजली चली गयी. टीवी की आवाज़ आनी बंद हो गई. बारिश और तेज़ हो गई. दूर बस्ती से किसी माँ के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ आने लगी. फिर कोई बच्चा बारिश और हैज़े की भेंट हो गया.

वैसे ही जड़ बैठे रहे हम दोनों. मैं अपने घर के लिए निकलने की सोच ही रहा था, कि वह अचानक उठ खड़ा हुआ.

“हम ऐसे कैसे हो सकते हैं? हमारी आँखों के सामने ये अनर्थ होता है, बहाने दिये जाते हैं कि बजट नहीं है. लेकिन राजा की विदेश यात्रा के लिए कोष में धन है. यहाँ बच्चों की जानें जा रही हैं उसकी किसी को परवाह नहीं, पर उस निर्जीव मुकुट के यत्न में कोई कमी नहीं आती कभी.”

मैं भौंचक्का उसे देख रहा था. अभी घंटे भर पहले वही इस राज और मुकुट की वंदना करते नहीं थक रहा था.

“पर ये तो हमारा गौरव चिह्न है. दुनिया के किसी देश में इतना भव्य मुकुट नहीं मिलेगा.”

“दुनिया के किसी देश में हमारे जैसी भुखमरी, भ्रष्टाचार और सरकारी आतंक भी तो नहीं मिलेगा. ऐसा मुकुट का क्या गौरव, जब देश की हालत पे शर्म आती हो? मैं तो… ”

वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाया था, कि अचानक मकान का दरवाज़ा टूटा. धूल का गुबार छँटा तो देखा, एक सैन्य टुकड़ी खड़ी है. वही विशिष्ट पोशाक पहने.

“हम राजमुकुट रक्षा दल हैं. तुम्हें राजद्रोह, और देश के गौरव चिह्न हमारे राजमुकुट के खिलाफ बग़ावत के जुर्म में गिरफ्तार किया जाता है.”

“पर हमने तो कुछ किया भी नहीं.”

“सोचा, यही क्या कम है? और सोचने वालों से ही तो हमारे राज को ख़तरा है.”

वागर्थ मिल गया!

हिन्दी साहित्य पढ़ते हैं? हां? कमाल है! कम लोग बचे हैं ऐसे. अरे मज़ाक कर रहा हूं!

ऐसा नहीं है. काफी हिन्दी साहित्य प्रेमी हैं आज भी, और इंटरनेट पर तो बहुत हैं. इतने सारे हिन्दी के ब्लॉग भी हैं.

पर एक कमी खलती रहती है – एक अच्छे हिन्दी मासिक की. धर्मयुग और पराग तो जाने कहां इतिहास में खो गये. एक कादंबिनी भी किसी स्टैंड में मिले, किसी में नहीं. लाइफस्टाइल मैगज़ीन और महिलाओं की हिन्दी पत्रिकाएं कहीं ज़्यादा बिकती हैं, बेशक.

जब कलकत्ते में था, कलकत्ता पुस्तक मेले का खास मुरीद था, और जिस ज़माने में ब्लाग का आविष्कार नहीं हुआ था, और यूनिकोड के प्रचलन से कहीं पहले जब मैं खास फॉण्ट की मदद से एक हिन्दी साहित्य की वेबसाइट चलाता था, उस ज़माने में भारतीय भाषा परिषद से परिचय हुआ. और यह पता चला कि आज भी हिन्दी साहित्य की दुनिया में कलकत्ता की महत्ता हैं, बेशक उतनी न हो जितनी ‘निराला’ और ‘मस्ताना’ के काल में थी. परिषद की मासिक पत्रिका वागर्थ से भी मैं तभी परिचित हुआ.

साहित्य, कला, और तकनीकी गुणवत्ता, सभी में वागर्थ अपने समकालीन हिन्दी मासिकों से कहीं आगे लगा मुझे. उस दिन से जनाब वागर्थ के फैन हुए. अपने घर में भी दो सब्स्क्रिप्शन्स लगवा दिए. और फिर कलकत्ते से रफू-चक्कर हो गये.

कभी-कभार कलकत्ते का चक्कर लगाते हुए किसी चाचा के घर जाना हुआ तो Reader’s Digest के साथ वागर्थ भी पढ़ता.

आज पता नहीं कैसे कुछ हिन्दी ब्लॉग पढ़ते हुए वागर्थ की याद आ गई, तो मन में सवाल उठा – कहीं वह भी तो और अच्छी हिन्दी पत्रिकाओं की तरह डब्बे में… गूगल देव से विनती की, और पाया कि vagarth लिखो तो पहला उत्तर भारतीय भाषा परिषद के साइट का लिंक ही आता है. क्लिक किया और पाया कि वागर्थ न केवल ज़िन्दा है, बल्कि हर माह बाकायदा प्रकाशित भी हो रहा है!

और सबसे आश्चर्य की बात यह थी, कि पूरे के पूरे संस्करण PDF रूप में मुफ्त उपलब्ध हैं. सन् 2010 के ही सही.

मैं तो अब इस साइट पर ही व्यस्त रहने वाला हूं. आपका क्या ख़याल है?

सदी क्या हुई है भाईसाहब?

किस युग में रहते हैं आप? मुझे लगता था इक्कीसवीं सदी चल रही है. आजकल थोड़ा शक होने लगा है. टीवी पर समाचार चैनल वाले यूं ही परेशान करे बैठे हैं – स्वर्ग का द्वार, रावण की मम्मी, फिल्मी गाने से आकर्षित होने वाले भूत तो हम देख चुके हैं. पर टीवी पर शापिंग वाले प्रोग्राम भी पीछे नहीं रहे. बेजन दारूवाला के राशिफल, और नक्षत्र वाले पत्थर तो हम देख ही रहे हैं, पर अगर कोई ये सब देखता है तो वक्त की बर्बादी के अलावा मुझे नहीं लगता कोई और नुकसान हो रहे हैं.

लेकिन आजकल एक नई ऑफरिंग आई है टेलि-मार्केट में – नज़र से बचाव! फिल्मों ने हमें इसी एक संभावना के बारे में अवगत कराया था कि नज़र से प्यार होता है और शायरी की भाषा में नज़र से लोग घायल होते हैं और मेटाफॉर में मर जाते हैं. लेकिन “बुरी नज़र”, उसके पीछे की बुरी नीयत और उससे होने वाले नुकसानों के बारे में मां, चाची-ताई वगैरह के अलावा किसी और से नहीं सुना था. बेशक घर में कोई नवजात बहुत रोता था, तो नज़र की बात ज़रूर उठती थी, और ये भी चर्चा होती थी कि किस नासपीटे की नज़र लगी होगी. पर सिर्फ ज़िक्र भर होता था. हम उसे विलेन बनाकर झगड़ने नहीं लगते थे – आखिरकार दो पीढ़ियों से शहर में रहने का असर तो होगा, भले ही हम आज भी “नज़र” जैसी चीज़ों पर विश्वास कर रहे हैं. और एक लेवल पर नज़र की बात होती रहती है – यूंही कहना कि नज़र लगी है किसीकी, कहने का मतलब कि वो इंसान तारीफ़ तो कर गया, पर मन ही मन जल भुन रहा होगा. उसकी इस नज़र से हमें असल में नुकसान होगा, ये तो हम शायद सोचते भी नहीं आजकल.

पर टीवी के टेली-व्यापारी चाहते हैं कि हम सोचें. आजकल नज़र को इतनी गंभीर समस्या के तौर पर पेश कर रहे हैं, मानो अगर हर इंसान के पास ये नज़र-शोधक तावीज़ नहीं हों तो बाकी दुनिया सिर्फ अपनी आंखों से देख-देखकर सभी को बीमार, कंगाल और अपाहिज बना देगी. ये दिखाने के लिए जो तस्वीरें आती हैं टीवी पर, उनमें आंखों से निकलती किरणें देखकर सुपरमैन और नागराज कामिक्स की याद आ जाती है.

इतना बुरा नहीं लगता, अगर इतनी बेशर्मी से इस दकियानूसी और पैरानॉइड विचार को बढ़ा चढ़ा कर दर्शक के मन में स्थापित करने की कोशिश नहीं होती कि सारी दुनिया के सारे लोग, खासकर वो जो आपके करीब हैं, आपका बुरा ही चाहते हैं. कि आपके सब दुख-तकलीफों की जड़ दूसरे लोग हैं, और उनमें ये दैवी शक्ति है कि सिर्फ देखकर और बुरा चाहकर आपका बुरा कर सकते हैं. और इतना बुरा कर सकते हैं कि जब तक आप यह चमत्कारी तावीज़ नहीं खरीदते, तब तक आपकी तकलीफें दूर नहीं होने की. वही तावीज़ जो दस साल पहले टूरिस्ट तीर्थस्थानों की दुकानों में बच्चे पांच-पांच रुपये में खरीदते थे, बस खेलने और देखने के लिए. आजकल इन खिलौनों में दैवी शक्तियां आ गई हैं, आपको दुनिया के सबसे बड़े खतरे से बचाने के लिए!

टीवी भी क्या करे? एक मीडियम ही तो है. इसी टीवी पर नैशनल जियोग्राफिक के कार्यक्रम देखता हूं, और इसी टीवी पर दुनिया के एक हिस्से को पंद्रहवीं सदी की ओर जाते देखता हूं. शायद यही है वह भारतीय संस्कृति जिसके लिए इतनी मारपीट चालू है.